लखनऊ:-
पूर्व मुख्यमंत्री बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती को एससी-एसटी रिजर्वेशन पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले में उम्मीदें नजर आती हैं। मायावती के पास अपनी पार्टी के वोटबैंक को बचाने का एक बड़ा मौका मिला है।इसे मायावती अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहती हैं।यही कारण है कि आजकल मायावती एसटी-एससी आरक्षण में क्रीमी लेयर के मुद्दे पर सुबह-सुबह ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर इस मुद्दे को सियासी धार देने की कोशिश की है।
मायावती और उनकी पार्टी बसपा भीषण संकट के दौर से गुजर रही है।चुनावी नतीजों से ऐसा ही लगता है।सियासी ताकत के हिसाब से उत्तर प्रदेश बसपा का केंद्र रहा है।यूपी की मायावती चार बार सीएम रह चुकी हैं,लेकिन उसी यूपी में लोकसभा चुनाव में बसपा का खाता नहीं खुला।दशकों बाद बसपा का वोट शेयर घट कर सिंगल डिजिट पर पहुंच गया है।
लोकसभा चुनाव में बसपा अकेले चुनाव लड़ी और उसे 9.3 फीसदी वोट मिले।साल 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा एक सीट ही जीत पाई।विपक्ष बसपा पर भाजपा की बी टीम होने का आरोप लगता रहा है।ऐसे में मायावती को एक मजबूत मुद्दे की तलाश है,जिसके दम पर बसपा ये बता सके कि समय खराब है,लेकिन भविष्य नहीं।
मायावती बसपा को पुराने फार्म में लाने के लिए जुटी हैं,लेकिन उनके सामने चुनौतियों का पहाड़ है।अब तक बसपा का साथ दे रहा दलित वोटर धीरे-धीरे सपा और कांग्रेस में जाने लगा है। गैर जाटव वाल्मीकि,खटीक और सोनकर जाति के वोटर तो पहले ही भाजपा में जा चुके हैं।दलित समाज की युवा पीढ़ी चंद्रशेखर रावण की तरफ जाने लगी है।
मायावती के भतीजे आकाश आनंद ने लोकसभा चुनाव के प्रचार की शुरुआत नगीना से की थी।चंद्रशेखर रावण नगीना से अपनी पार्टी से लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे।चंद्रशेखर सांसद भी बन गए हैं।चंद्रशेखर हर मंच से मायावती को अपना नेता बताते हैं,लेकिन उनकी पार्टी बसपा का वोट काट रही है।लंबे समय बाद बसपा नेताओं का जोश हाई है।भारत बंद के दौरान देश के कई जगहों पर बसपा के कार्यकर्ता नीले झंडे लेकर पहुंचे।सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ बसपा समर्थक सड़कों पर उतरे।
बसपा में धरना और प्रदर्शन की परंपरा नहीं रही है,लेकिन इस बार तो भारत बंद में पटना से लेकर देवरिया तक बसपा कार्यकर्ता पुलिस से भिड़ गए।लाठी भी खाई डंडे भी खाए, लेकिन कोटे के अंदर कोटे वाले आरक्षण का विरोध जारी रहा।मायावती को इतने बड़े समर्थन की उम्मीद नहीं थी। लोकसभा चुनाव में तो बसपा का खाता तक नहीं खुल पाया। यूपी में बसपा का बस एक विधायक है।ऐसी स्थिति में कार्यकर्ताओं के उत्साह ने मायावती को एक नई ताकत दे दी है।
बसपा के एक नेता इस बात से दुखी थे कि बहिन जी सोशल मीडिया तक ही सिमट गई हैं,लेकिन मायावती ने कई सालों बाद बसपा कार्यकर्ताओं को सड़क पर उतारा।सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बहाने मायावती की कोशिश अपना वोट बैंक बचाने की है।पिछले कुछ समय से मायावती अपने दिन की शुरुआत इसी मुद्दे से करती हैं।सोशल मीडिया पर सवेरे-सवेरे मायावती दलित आरक्षण को लेकर भाजपा, कांग्रेस और सपा के खिलाफ लिखती हैं।एससी रिजर्वेशन में क्रीमी लेयर से लेकर सब कैटेगरी बनाने का मायावती जबरदस्त विरोध कर रही हैं। मायावती को लगता है इस फैसले से यूपी में दलित वोट का बिखराव रूक सकता है।
मायावती ने 27 अगस्त को लखनऊ में बसपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाई है।देश भर से बसपा के सीनियर नेता बैठक में शामिल होने के लिए लखनऊ पहुंचेंगे। इस बैठक में मायावती को फिर से बसपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना जाएगा।इससे पहले मायावती 2019 में अध्यक्ष बनीं थीं।पहले तीन साल पर बसपा के अध्यक्ष का चुनाव होता था पर अब पांच सालों बाद चुनाव होने लगे हैं।
मायावती से पहले कांशीराम बसपा के अध्यक्ष चुने जाते रहे। कांशीराम की तबीयत बिगड़ने के बाद पहली बार मायावती 18 सितंबर 2003 को बसपा अध्यक्ष चुनी गई थीं।लखनऊ में होने वाली बैठक का पहला एजेंडा बसपा के अध्यक्ष का चुनाव है।फिर दलित रिजर्वेशन पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ मायावती देश भर में जन समर्थन जुटाना चाहती हैं। मायावती ने मोदी सरकार से संसद में बिल लाकर कोर्ट के फैसले को बदलने की मांग की है।इसी इमोशनल मामले से मायावती अपनी खोई हुई जनाधार को वापस पाने की तैयारी में हैं।

