डीके सिंह //🙏नित्य समाचार रामपुर🙏 (तहसील अध्यक्ष:- ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन उत्तर प्रदेश, प्रदेश सचिव:- राष्ट्रीय अटल जनता पार्टी, प्रदेश अध्यक्ष :-यूथ सभा भारतीय किसान यूनियन अ टिकैत )
👉उत्तर प्रदेश की ग्रामीण राजनीति में एक ऐसा यू-टर्न देखने को मिला है जिसकी उम्मीद आम तौर पर नौकरशाही के गलियारों में नहीं की जाती। राज्य सरकार ने त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला और ऐतिहासिक फैसला लिया है। अब तक की स्थापित परंपराओं को किनारे रखते हुए सरकार ने तय किया है कि पंचायत चुनावों में हो रही देरी के बीच गांवों की कमान किसी सरकारी अधिकारी को सौंपने के बजाय निवर्तमान ग्राम प्रधानों के हाथों में ही रहने दी जाएगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इस फैसले को राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों ही हलकों में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सोमवार को पंचायती राज विभाग की ओर से इस संबंध में एक विस्तृत शासनादेश भी जारी कर दिया गया। इस फैसले के बाद राज्य के हजारों ग्राम प्रधानों को उनके पांच साल का कार्यकाल समाप्त होने के ठीक बाद प्रशासक की नई भूमिका में तैनात कर दिया गया है।
👉इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए साल 2021 में हुए पंचायत चुनावों के आंकड़ों और नियमों को देखना जरूरी है। उस वक्त राज्य में लगभग अट्ठावन हजार से ज्यादा ग्राम प्रधान चुनकर आए थे। इन सभी नवनिर्वाचित प्रधानों की पहली आधिकारिक बैठक मई के अंतिम सप्ताह में आयोजित की गई थी। पंचायती राज अधिनियम के नियमों के अनुसार इन सभी का पांच साल का कार्यकाल अब समाप्त हो रहा था।
👉पुरानी व्यवस्था के तहत जैसे ही ग्राम प्रधानों का कार्यकाल खत्म होता था, वैसे ही संबंधित विकास खंड के सहायक विकास अधिकारी यानी एडीओ पंचायत को उस गांव का प्रशासक नियुक्त कर दिया जाता था। इसका सीधा मतलब यह होता था कि गांव के विकास कार्यों और बजट की पूरी ताकत अस्थाई रूप से सरकारी तंत्र के पास चली जाती थी। लेकिन इस बार प्रधानों के बढ़ते दबाव और जमीनी राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए सरकार ने नौकरशाही को पीछे धकेलते हुए इस व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया।
👉नए शासनादेश के मुताबिक निवर्तमान ग्राम प्रधान अब प्रशासक के तौर पर अपनी नई पारी की शुरुआत कर रहे हैं। यह नई व्यवस्था या तो अगले छह महीने के लिए लागू रहेगी या फिर नए पंचायत चुनाव होने के बाद बनने वाली नई ग्राम पंचायत की पहली बैठक तक प्रभावी मानी जाएगी। हालांकि इस नई भूमिका के साथ कुछ कानूनी बंदिशें भी जुड़ी हुई हैं जो इन प्रधानों को असीमित शक्ति इस्तेमाल करने से रोकती हैं।
👉प्रशासक बनने के बाद भी ये निवर्तमान प्रधान पूरी तरह स्वतंत्र नहीं होंगे। वे गांवों की बागडोर तो संभालेंगे और रोजमर्रा के सामान्य कामकाज भी निपटाएंगे, लेकिन उनके पास कोई भी नीति विषयक यानी नीतिगत फैसला लेने का अधिकार नहीं होगा। इसका सीधा मतलब यह है कि वे गांव की बुनियादी जरूरतों और चालू योजनाओं को तो आगे बढ़ा सकेंगे, मगर किसी नए बड़े प्रोजेक्ट या नीतिगत बदलाव को मंजूरी नहीं दे पाएंगे।
👉इस पूरे प्रशासनिक फेरबदल के पीछे का असली कारण आगामी राजनीतिक कैलेंडर को माना जा रहा है। राज्य में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने की उम्मीद है जिसके लिए प्रशासनिक तैयारियां अभी से शुरू हो चुकी हैं। माना जा रहा है कि चुनावी व्यस्तताओं और सुरक्षा बलों की उपलब्धता को देखते हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव अब विधानसभा चुनावों के संपन्न होने के बाद ही कराए जा सकेंगे।
👉ऐसे संवेदनशील समय में सरकार ग्रामीण इलाकों के एक बड़े और प्रभावशाली जनप्रतिनिधि वर्ग को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहती थी। प्रधानों को प्रशासक बनाकर सरकार ने ग्रामीण स्तर पर असंतोष को तो थाम ही लिया है, साथ ही विकास कार्यों की रफ्तार को भी नौकरशाही की सुस्ती से बचा लिया है। चर्चा इस बात की भी तेज है कि आने वाले दिनों में जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लॉक प्रमुखों के लिए भी इसी तरह का फैसला लिया जा सकता है जिनका कार्यकाल जुलाई में समाप्त हो रहा है।

