ऑटोमेटिक गेट बने डैम के लिए आफत

​वर्ष 1922 में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान निर्मित यह भाखड़ा वियर पिछले 100 वर्षों से अधिक समय से 88 गांवों के किसानों की फसलों को सींच रहा है। ब्रिटिश इंजीनियरों ने इस प्रणाली को इस तरह डिजाइन किया था कि उत्तराखंड के हरिपुरा जलाशय से जरूरत के अनुसार पानी छोड़ा जाए। जलस्तर को नियंत्रित रखने के लिए डैम में लकड़ी के पटले इस्तेमाल किए जाते थे, ताकि पानी का दबाव एक सीमा से अधिक न बढ़े। हाल ही में 30 करोड़ रुपये की कायाकल्प परियोजना के तहत इन पटलों को हटाकर ऊंचे ऑटोमेटिक गेट लगा दिए गए।

​ज्यादा पानी रोकने के उद्देश्य से ऑटोमेटिक गेट तो लगा दिए गए, लेकिन एक सदी पुराने बांध के ढांचे को मजबूत नहीं किया गया। ऑटोमेटिक गेट बंद होने से जलभराव का असामान्य दबाव सीधे कमजोर बंदे और वियर गेट पर आ गया

करीब 15 दिन पहले बंदे में दरार आने पर सिंचाई विभाग ने लकड़ी की बल्लियों और मिट्टी से भरे कट्टों की मदद से केवल औपचारिक लीपापोती की थी। पुख्ता तकनीकी मरम्मत के बिना पानी रोके रखने के कारण मंगलवार को आखिरकार वियर गेट के पास दरार आ गई और नहर की पुलिया धंस गई।