रामपुर🇮🇳🇮🇳
नित्य समाचार👁👁
*लाचारी बेबसी का फायदा उठाकर तिल तिल मार देते गरीबों को सूदखोर, तो कोई कर लेता आत्महत्या..!!*
देश के राज्यों में चल रहा सूदखोरी का धंधा लोगों की जान पर भारी पड़ रहा है!कई राज्यों में ब्याज पर रकम उधार देने वाले लोगों का तंत्र अब माफिया के तौर पर उभर कर भी सामने आ रहा है! इससे तंग लोगों के आत्महत्याएं करने की खबरें भी सामने आती रहती हैं!प्रदेशो में पिछले कई सालों से अलग अलग शहरों में कई लोगों की खुदकुशी करने की खबरे सामने आती रहती है उसके पीछे सूदखोरों के परेशान करने की वजह ही सामने आती है!ऐसे मामलों में पुलिस भी अपनी लाचारी दिखाती है और सिर्फ आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज कर प्रकरण को ठंडे बस्ते में डाल देती है!एक कर्ज चुकाने को लेते हैं तो दूसरा कर्ज सूदखोर के इन धंधेबाजों ने बड़े कायदे से अपना जाल बिछा देता है। पहले कर्ज लिए आदमी को खूब परेशान करते हैं, इसके बाद दूसरा सूदखोर मददगार बनकर आता है और वह ब्याज चुकाने को नया कर्ज दे देता है। उलझन में पड़ा आदमी दूसरा कर्ज लेकर पहले कर्ज का ब्याज चुकाता है। अभी वह सांस भी नहीं ले पाता, तब तक दो कर्जों का ब्याज एक साथ चुकाने का दबाव पड़ना शुरू होता है। अब यहां से उसकी व्यवस्था बिगड़ने लगती है। आय के स्रोत दुकान, खेती पर नजर गड़ाए सूदखोर वहां अपना कब्जा जमाते हैं, जिससे किस्त टूटनी शुरू होती है। इसके बाद ब्याज का ब्याज ही मूलधन से कई गुना अधिक हो जाता है और आदमी कर्जाें के इस मकड़जाल से बाहर निकलने के बाद मकान, दुकान, जमीन बेचने लगता है। कई बार इसके चक्कर में लोग इतने तनाव में आ जाते हैं कि खुद आत्मघाती कदम भी उठा लेते हैं। लेकिन, सूदखोरों पर कार्रवाई नहीं होती है!इन सूदखोरों के अधिकतर शिकार मध्यम व छोटे व्यवसायी होते हैं सब्जी-फल का व्यवसाय करने वाले हों या कम जोत वाले किसान, जिन्हें बेटी की शादी या खेती के लिए मजबूरन इनकी शरण में जाना पड़ता है।ये लोग इन्हीं सूदखोरों से तीन से पांच रुपये सैकड़ा प्रतिमाह के हिसाब से कर्ज लेते हैं।हिसाब लगाइए, अगर किसी ने एक लाख रुपये का कर्ज तीन रुपये प्रति सैकड़ा पर लिया हो उसे एक महीने में बतौर ब्याज तीन हजार रुपये देने होंगे. सलाना उसे 36,000 रुपये की राशि देनी होगी,प्रतिशत के हिसाब से यह आंकड़ा सालाना 36 से 50 प्रतिशत तक पहुंच जाता है।साफ है, कर्जदार को एक भारी रकम सूद के रूप में देनी पड़ती है, अगर किसी महीने ब्याज की रकम नहीं दी तो वह मूलधन में जुड़ जाती है। उससे चक्रवृद्धि ब्याज वसूला जाता है,इसलिए कर्ज के मूलधन से ज्यादा सूद देना पड़ जाता है। अगर कर्ज ली गई रकम किसी भी वजह से डूब गई तो फिर पूछिए ही मत।वैसे कई बार इन सूदखोरो के चक्कर में लोग इतने तनाव में आ जाते हैं कि खुद आत्मघाती कदम भी उठा लेते हैं। लेकिन, सूदखोरों पर कार्रवाई नहीं होती है।ब्याज पर रकम मुहैया कराने वाले लोगों का यह धंधा पूरी तरह से गैरकानूनी है पर उसके खात्मे के लिए सरकार की तरफ से कभी कोई कदम नहीं उठाया गया है!!

